Friday, October 2, 2026
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भारत में बढ़ रहा फैटी लिवर का खतरा, 100 में 39 वयस्क प्रभावित; बच्चों में भी 35.4% अनुमान

नई दिल्ली: फैटी लिवर अब सिर्फ उम्रदराज लोगों तक सीमित बीमारी नहीं रह गई है। बदलती जीवनशैली, बढ़ता मोटापा, डायबिटीज और खान-पान की आदतों में बदलाव के बीच इस बीमारी का खतरा बच्चों और युवाओं में भी बढ़ता दिखाई दे रहा है। खास चिंता की बात यह है कि शुरुआती दौर में फैटी लिवर के लक्षण अक्सर स्पष्ट नहीं होते, जिसके कारण कई लोगों को बीमारी का पता काफी देर से चलता है।

नई दिल्ली में आयोजित विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी कांग्रेस-2026 में विशेषज्ञों ने भारत में लिवर और पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते बोझ पर चर्चा की। सम्मेलन में सामने रखे गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत में करीब 39 प्रतिशत वयस्कों में फैटी लिवर की समस्या होने का अनुमान है। वहीं, भारतीय बच्चों में भी इसका अनुमान 35.4 प्रतिशत तक बताया गया है।

सिर्फ शराब को जिम्मेदार मानना सही नहीं

लिवर में जरूरत से ज्यादा वसा जमा होने की स्थिति को फैटी लिवर कहा जाता है। आमतौर पर लिवर की बीमारी का नाम सुनते ही शराब को इसका प्रमुख कारण माना जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक फैटी लिवर के पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।

मोटापा, डायबिटीज, ज्यादा कैलोरी वाला भोजन, शारीरिक गतिविधियों की कमी और खराब जीवनशैली इसके जोखिम को बढ़ा सकते हैं। ऐसे में फैटी लिवर की रोकथाम के लिए केवल शराब से दूरी बनाना ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता, बल्कि पूरे मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी जरूरी है।

बच्चों में बढ़ता खतरा चिंता का विषय

फैटी लिवर के बढ़ते मामलों में बच्चों का शामिल होना विशेषज्ञों के लिए विशेष चिंता का विषय है। बच्चों में बढ़ता वजन, जंक फूड और हाई-कैलोरी डाइट के साथ शारीरिक गतिविधियों की कमी लिवर की सेहत को प्रभावित कर सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता को बच्चों के वजन में लगातार बढ़ोतरी को केवल सामान्य विकास मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। संतुलित खान-पान और नियमित शारीरिक गतिविधियों को बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बनाना जरूरी है।

पाचन संबंधी समस्याओं को भी नजरअंदाज न करें

विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी कांग्रेस-2026 में सिर्फ फैटी लिवर ही नहीं, बल्कि पाचन तंत्र से जुड़ी अन्य समस्याओं पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों के मुताबिक कब्ज, दस्त और पेट से जुड़ी दूसरी परेशानियां दुनिया भर में बेहद आम हैं।

एम्स के विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि कुछ लक्षणों को सामान्य मानकर लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। मल में खून आना या निगलने में परेशानी जैसे संकेत सामने आने पर चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

61 देशों के विशेषज्ञों ने लिया हिस्सा

30 सितंबर से 3 अक्टूबर 2026 तक आयोजित विश्व गैस्ट्रोएंटरोलॉजी कांग्रेस में करीब 61 देशों के 3,000 विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं। भारत में पहली बार आयोजित हो रहे इस सम्मेलन में पाचन तंत्र और लिवर से जुड़ी बीमारियों के बदलते स्वरूप पर चर्चा की जा रही है।

सम्मेलन का मुख्य विषय पाचन तंत्र के स्वास्थ्य में बदलाव और प्रकृति के संरक्षण से जुड़ा है। कार्यक्रम के पहले दिन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी देश में लिवर और पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते बोझ को लेकर चिंता जताई और लोगों को सतर्क रहने की जरूरत बताई।

बीमारी की जांच में AI की भूमिका पर भी चर्चा

सम्मेलन में स्वास्थ्य क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के बढ़ते इस्तेमाल पर भी विशेषज्ञों ने चर्चा की। शोधकर्ता पाचन तंत्र से जुड़ी कई बीमारियों की पहचान और जांच को अधिक प्रभावी बनाने के लिए AI आधारित तकनीकों पर काम कर रहे हैं।

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS), सीलिएक रोग की बायोप्सी के विश्लेषण और अग्न्याशय की गांठों की पहचान में AI के संभावित इस्तेमाल पर शोध जारी है। लंबे समय तक रहने वाली सूजन और अग्न्याशय के कैंसर की पहचान में भी इस तकनीक की संभावनाओं पर अध्ययन किया जा रहा है।

विशेषज्ञों की सलाह क्या है?

फैटी लिवर के बढ़ते मामलों के बीच विशेषज्ञों का जोर स्वस्थ जीवनशैली अपनाने पर है। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि, वजन को नियंत्रित रखना और डायबिटीज जैसी स्थितियों पर नजर रखना लिवर की सेहत के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

कुल मिलाकर, फैटी लिवर को केवल वयस्कों की बीमारी मानना अब सही नहीं होगा। बच्चों में सामने आ रहे मामलों ने इस समस्या को लेकर जागरूकता और समय पर जांच की जरूरत को और महत्वपूर्ण बना दिया है।

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