Friday, October 9, 2026
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किशोरों की मानसिक सेहत पर बढ़ रहा चिंता का असर, जानें लक्षण और बचाव के उपाय

पढ़ाई का बढ़ता दबाव, सोशल मीडिया पर दूसरों से तुलना और भविष्य को लेकर अनिश्चितता किशोरों की मानसिक सेहत को प्रभावित कर सकती है। इस उम्र में होने वाले शारीरिक और भावनात्मक बदलावों के बीच कई किशोर चिंता और घबराहट का सामना करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में लगभग हर सात में से एक किशोर 10 से 19 वर्ष की उम्र के बीच किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित होता है। एंग्जायटी यानी अत्यधिक चिंता भी किशोरों में पाई जाने वाली आम समस्याओं में शामिल है।

विशेषज्ञों के अनुसार, समय रहते लक्षणों को पहचानना और सही सहायता लेना जरूरी है। लगातार बनी रहने वाली चिंता पढ़ाई, नींद, सामाजिक संबंधों और रोजमर्रा की गतिविधियों पर असर डाल सकती है।

शरीर में भी दिखाई दे सकते हैं एंग्जायटी के संकेत

एंग्जायटी का असर केवल सोच और भावनाओं तक सीमित नहीं रहता। कई बार इसके शारीरिक लक्षण भी सामने आते हैं। इनमें दिल की धड़कन तेज होना, सिरदर्द, चक्कर आना, अधिक पसीना आना, हाथ-पैर कांपना और सांस लेने में परेशानी महसूस होना शामिल हो सकता है।

कुछ किशोरों को पेट में दर्द, मितली, भूख में बदलाव या नींद से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं। हालांकि, ऐसे लक्षण अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी हो सकते हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है।

बार-बार चिंता करना और ध्यान लगाने में परेशानी

मानसिक स्तर पर एंग्जायटी से प्रभावित किशोर छोटी-छोटी बातों को लेकर भी परेशान रह सकते हैं। भविष्य में क्या होगा, परीक्षा में अच्छे अंक आएंगे या नहीं और दूसरे लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं, जैसी चिंताएं उनके मन में लगातार चल सकती हैं।

इसके अलावा पढ़ाई में ध्यान न लगना, बेचैनी, चिड़चिड़ापन, बार-बार डर महसूस होना और रात में ठीक से नींद न आना भी चिंता से जुड़े संकेत हो सकते हैं। यदि ये परेशानियां लंबे समय तक बनी रहें और रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने लगें, तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

व्यवहार में बदलाव को भी समझें

किशोरों में चिंता का असर उनके व्यवहार पर भी पड़ सकता है। कुछ बच्चे दोस्तों और परिवार से दूरी बनाने लगते हैं, जबकि कुछ नई गतिविधियों या ऐसी जगहों पर जाने से बचते हैं, जहां उन्हें असहजता महसूस होती है। कुछ मामलों में वे किसी काम को लेकर बार-बार आश्वासन मांग सकते हैं या एक ही गतिविधि को दोहराने लगते हैं।

माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में अचानक आए बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। उन्हें डांटने या उनकी परेशानी को छोटी बात मानकर टालने के बजाय, उनकी बात ध्यान से सुनना और उन्हें सुरक्षित माहौल देना अधिक उपयोगी हो सकता है।

एंग्जायटी कम करने में मददगार हो सकते हैं ये उपाय

खुलकर बातचीत करें: अपनी परेशानी किसी भरोसेमंद दोस्त, माता-पिता, शिक्षक या काउंसलर के साथ साझा करें।

शारीरिक गतिविधि अपनाएं: नियमित टहलना, दौड़ना, साइकिल चलाना या पसंदीदा खेल खेलना तनाव कम करने में मदद कर सकता है।

गहरी सांस लेने का अभ्यास करें: धीमी और नियंत्रित सांस लेने तथा मेडिटेशन से मन को शांत करने में सहायता मिल सकती है।

नींद का ध्यान रखें: नियमित समय पर सोने-जागने की आदत बनाएं और सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करें।

काम की योजना बनाएं: पढ़ाई और अन्य जिम्मेदारियों को छोटे हिस्सों में बांटें, ताकि एक साथ बहुत अधिक दबाव महसूस न हो।

कैफीन और नशीले पदार्थों से बचें: चाय-कॉफी का अत्यधिक सेवन कम करें और सिगरेट, शराब व अन्य नशीले पदार्थों से दूर रहें।

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