भारतीय सिनेमा की चकाचौंध भरी दुनिया में, जहाँ अक्सर सामाजिक-प्रशासनिक मुद्दों को स्टारडम के पीछे छिपा दिया जाता है, उद्योग की दो सबसे प्रमुख हस्तियों के बीच एक वैचारिक दरार पैदा हो गई है। फिल्म निर्माता राम गोपाल वर्मा (आरजीवी) ने संगीत सम्राट ए.आर. रहमान के उन हालिया दावों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें रहमान ने हिंदी फिल्म उद्योग में “सांप्रदायिक पूर्वाग्रह” का संकेत दिया था। वर्मा ने एक व्यावहारिक तर्क पेश किया है: फिल्म उद्योग धर्म से नहीं, बल्कि केवल ‘मुनाफे’ की दौड़ से चलता है।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब ऑस्कर विजेता संगीतकार ए.आर. रहमान ने कुछ सार्वजनिक बयानों में कहा कि पिछले आठ वर्षों में उनके पास बॉलीवुड से काम कम हो गया है। रहमान ने इशारा किया कि उद्योग के भीतर बढ़ते सांप्रदायिक माहौल के कारण उन्हें किनारे किया जा रहा है।
आरजीवी का नजरिया: पैसा सबसे बड़ा धर्म
‘सत्या’ और ‘कंपनी’ जैसी फिल्मों के लिए जाने जाने वाले और 90 के दशक में रहमान के साथ काम कर चुके राम गोपाल वर्मा ने फरीदून शहरयार के पॉडकास्ट पर इस मुद्दे पर खुलकर बात की। वर्मा का मानना है कि मुंबई के फिल्म हलकों में व्यावसायिक सफलता ही एकमात्र पैमाना है।
आरजीवी ने कहा, “मैं सांप्रदायिक पहलू पर उनके द्वारा कही गई बातों पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता, क्योंकि मैं उस पर विश्वास नहीं करता। मुझे लगता है कि फिल्म उद्योग केवल पैसा बनाने के बारे में है। जो उनके लिए पैसा कमाता है, वे उसी के पीछे जाएंगे। उन्हें आपकी जाति, धर्म या आप कहां से हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
वर्मा का तर्क है कि यदि दक्षिण भारतीय फिल्मों के निर्देशक ब्लॉकबस्टर फिल्में बना रहे हैं, तो हिंदी फिल्म उद्योग उनके पीछे भागेगा, चाहे उनका क्षेत्रीय या सांस्कृतिक बैकग्राउंड कुछ भी हो।
“हिट” का फॉर्मूला: ऐतिहासिक मिसालें
अपने दावे को पुख्ता करने के लिए वर्मा ने दिवंगत दिग्गज गायक एस.पी. बालसुब्रमण्यम (एसपीबी) का उदाहरण दिया। दक्षिण भारतीय होने के बावजूद, एसपीबी 80 के दशक के अंत और 90 के दशक की शुरुआत में सलमान खान की आवाज बने थे।
वर्मा ने समझाया, “जब सूरज बड़जात्या ने ‘मैंने प्यार किया’ और ‘हम आपके हैं कौन’ के लिए एस.पी. बालसुब्रमण्यम को लिया था, तो वे गाने बहुत बड़े हिट थे। यही वजह थी कि उन्हें लिया गया। जिस क्षण गाने काम नहीं करते, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप हिंदी भाषी हैं, तेलुगु हैं या तमिल; कोई अंतर नहीं पड़ता।”
इस तर्क के माध्यम से वर्मा का सुझाव है कि यदि रहमान जैसे दिग्गज के पास प्रोजेक्ट्स में कमी आई है, तो इसका कारण बदलते संगीत के रुझान या हालिया फिल्मों का बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन हो सकता है, न कि कोई वैचारिक बदलाव।
सोना महापात्रा की असहमति: क्या सच में रहमान को दरकिनार किया गया?
बहस केवल निर्देशकों तक सीमित नहीं रही है। गायिका सोना महापात्रा ने भी रहमान के दावों को चुनौती दी है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए उन्होंने रहमान के पास मौजूद बड़े प्रोजेक्ट्स का हवाला दिया।
महापात्रा ने कहा, “उन्होंने ‘छावा’ का संगीत दिया। वे ‘रामायण’ का संगीत दे रहे हैं। वे देश के सबसे बड़े और हाई-प्रोफाइल प्रोजेक्ट्स से जुड़े हुए हैं।” उन्होंने सुझाव दिया कि रहमान की वैश्विक व्यस्तताओं और लगातार यात्राओं के कारण वे कई प्रोजेक्ट्स के लिए उपलब्ध नहीं हो पाते होंगे, जिसे “हाशिए पर धकेला जाना” नहीं कहा जा सकता।
व्यक्तिगत अनुभव बनाम उद्योग का चलन
सांप्रदायिक सिद्धांत से असहमत होने के बावजूद, वर्मा ने रहमान की व्यक्तिगत भावनाओं को पूरी तरह से खारिज नहीं किया। उन्होंने स्वीकार किया, “मैं रहमान की ओर से नहीं बोल सकता क्योंकि मुझे नहीं पता कि उनके अनुभव क्या रहे हैं। क्या यह एक सामान्य बात है, या यह कुछ ऐसा था जो विशेष रूप से उनके साथ हुआ? इन बातों को जाने बिना, मैं उन पर टिप्पणी नहीं कर सकता।”
यह बहस के एक महत्वपूर्ण पहलू को उजागर करता है: पूरे उद्योग का चलन और किसी व्यक्ति के साथ हुआ विशेष व्यवहार, दो अलग चीजें हो सकती हैं।
बदलता बॉलीवुड संगीत
संदर्भ को समझने के लिए पिछले दशक में हिंदी फिल्म संगीत में आए बदलावों को देखना होगा। उद्योग अब “मल्टी-कंपोजर” (एक फिल्म में कई संगीतकार) मॉडल की ओर बढ़ गया है, जो 90 के दशक से बिल्कुल अलग है जब रहमान जैसा एक अकेला संगीतकार पूरी फिल्म का संगीत तैयार करता था। इसके अलावा, डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्वतंत्र संगीत के उदय ने कई नई आवाजों को मौका दिया है, जिससे स्थापित दिग्गजों के कार्यभार पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।



