‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीतियों और अनिश्चितताओं से भरे वैश्विक परिदृश्य में, एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। जैसे-जैसे यूरोपीय संघ नई दिल्ली के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को मजबूत कर रहा है, अमेरिका का एक और पारंपरिक सहयोगी—कनाडा—भी इसी राह पर है। दशकों तक अमेरिका का सबसे स्थिर आर्थिक साझेदार रहा कनाडा अब वाशिंगटन से मिलने वाले संरक्षणवादी दबावों और टैरिफ की धमकियों से बचने के लिए भारत के साथ अपने संबंधों को एक नई दिशा दे रहा है।
इस रिश्ते की नई गर्माहट मंगलवार को गोवा में ‘इंडिया एनर्जी वीक’ के दौरान साफ देखी गई। एक बड़े कूटनीतिक बदलाव का संकेत देते हुए, कनाडा के ऊर्जा मंत्री टिम हॉजसन और भारत के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने आधिकारिक तौर पर द्विपक्षीय मंत्रिस्तरीय ऊर्जा वार्ता को फिर से शुरू किया। दोनों देशों ने तेल, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई।
कूटनीतिक बर्फ पिघली: ट्रूडो युग से आगे का सफर
यह ‘रीसेट’ पूर्व कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल से पूर्ण अलगाव का प्रतीक है। 2023 में एक खालिस्तानी चरमपंथी की हत्या को लेकर ट्रूडो के आरोपों के बाद नई दिल्ली और ओटावा के संबंध ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गए थे। भारत ने इन आरोपों को “हास्यास्पद” बताते हुए खारिज कर दिया था, जिसके बाद व्यापार वार्ता रुक गई थी और कूटनीतिक संबंधों में गिरावट आई थी।
हालांकि, जब से मार्क कार्नी ने ट्रूडो के बाद प्रधानमंत्री का पद संभाला है, दोनों देशों ने व्यावहारिक हितों को प्राथमिकता दी है। इस बदलाव की शुरुआत पिछले जून में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कार्नी के बीच हुई मुलाकात से हुई थी।
भारतीय कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, “आर्थिक केंद्र अब बदल रहा है। नई दिल्ली और ओटावा दोनों यह समझते हैं कि वे अतीत की शिकायतों को भविष्य पर हावी नहीं होने दे सकते, खासकर तब जब अमेरिकी बाजार अब पहले जैसा सुरक्षित ठिकाना नहीं रह गया है।”
ट्रंप का प्रभाव: 100% टैरिफ का डर
कनाडा की भारत के प्रति इस बढ़ती दिलचस्पी का सीधा संबंध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और कार्रवाईयों से है। ट्रंप ने हाल ही में USMCA (कनाडा-मेक्सिको-अमेरिका समझौता) को “अप्रासंगिक” बताया है। ओटावा के लिए सबसे बड़ी चिंता ट्रंप की वह धमकी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि कनाडा चीन जैसे बड़े देशों के साथ व्यापार समझौते करता है, तो कनाडाई आयात पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा।
दावोस में पीएम कार्नी के भाषण के बाद, जिसमें उन्होंने बड़े देशों द्वारा “आर्थिक जबरदस्ती” की आलोचना की थी, तनाव और बढ़ गया। ट्रंप ने जवाब में कनाडा को अमेरिका के नेतृत्व वाली शांति पहल से बाहर कर दिया। इस अनिश्चितता ने कनाडा को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वह अपने ऊर्जा निर्यात के लिए 98% अमेरिका पर निर्भर नहीं रह सकता।
ऊर्जा और परमाणु सहयोग का रोडमैप
इस नए रिश्ते के पहले परिणाम मार्च की शुरुआत में देखने को मिलेंगे, जब प्रधानमंत्री मार्क कार्नी भारत का दौरा करेंगे। इस दौरान कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर होने की संभावना है:
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यूरेनियम आपूर्ति: भारत के नागरिक परमाणु कार्यक्रम के लिए 2.8 बिलियन कनाडाई डॉलर का 10 वर्षीय यूरेनियम आपूर्ति समझौता होने की उम्मीद है।
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हाइड्रोकार्बन: भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एलएनजी और एलपीजी निर्यात का विस्तार।
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भविष्य की तकनीक: हाइड्रोजन, जैव ईंधन, महत्वपूर्ण खनिज और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में साझेदारी।
सीईपीए (CEPA): व्यापारिक बाधाओं को तोड़ने की कोशिश
इस साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA) है। इसकी वार्ता 2010 में शुरू हुई थी, लेकिन कई बार रुकी। अब दोनों पक्ष इसे फिर से शुरू करने पर सहमत हुए हैं।
इस समझौते के मुख्य लक्ष्य हैं:
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सीमा शुल्क हटाना: व्यापारिक वस्तुओं के एक बड़े हिस्से पर आयात शुल्क को खत्म करना।
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कुशल पेशेवरों की आवाजाही: कनाडा में रहने वाली बड़ी भारतीय आबादी का लाभ उठाते हुए कुशल पेशेवरों के लिए नियमों को सरल बनाना।
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डिजिटल व्यापार: सीमा पार डेटा प्रवाह और निवेश के लिए नए मानक स्थापित करना।
2024 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 31 बिलियन कनाडाई डॉलर तक पहुँच गया था, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षमता का केवल एक छोटा हिस्सा है। कनाडा के ऊर्जा मंत्री टिम हॉजसन ने कहा, “कनाडा के लिए भारत तेजी से बढ़ते हिंद-प्रशांत क्षेत्र का प्रवेश द्वार है। हम दो ऐसी अर्थव्यवस्थाएं हैं जो एक-दूसरे की पूरक हैं—एक संसाधनों से समृद्ध है और दूसरी मांग से प्रेरित।”
भारत की बढ़ती रणनीतिक अहमियत
भारत भी अपनी व्यापारिक साझेदारी में विविधता लाने के लिए एक चतुर खेल खेल रहा है। ट्रंप की टैरिफ धमकियों के बीच, नई दिल्ली ने ईयू, यूके, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ समझौतों को गति दी है। कनाडा जैसे देशों के साथ जुड़कर, भारत एक बहुध्रुवीय दुनिया में खुद को एक स्थिर शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है।
भारत-कनाडा संबंध अब केवल लेन-देन वाले व्यापारिक रिश्ते से ऊपर उठकर एक रणनीतिक ढाल में बदल रहे हैं। जैसे-जैसे वैश्विक व्यापार अस्थिर हो रहा है, भारत उन देशों के लिए पसंदीदा साझेदार बनता जा रहा है जो भविष्य की अनिश्चितताओं से बचने के लिए स्थिरता की तलाश में हैं।



