Monday, January 26, 2026
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टियर 3 कॉलेज से गूगल तक: दृढ़ता ने बदली सफलता की परिभाषा

एक ऐसे दौर में जहाँ संस्थान की प्रतिष्ठा अक्सर करियर की दिशा तय करती है, गूगल की सॉफ्टवेयर इंजीनियर अर्ची गुप्ता की कहानी भारत के लाखों इंजीनियरिंग छात्रों के लिए आशा की एक नई किरण बनकर उभरी है। भोपाल के एक टियर 3 कॉलेज से पढ़ाई करने वाली अर्ची का टेक जगत के शिखर तक पहुँचने का सफर रातों-रात मिली सफलता नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास और अटूट दृढ़ता का परिणाम है।

अर्ची गुप्ता ने हाल ही में सोशल मीडिया पर अपने करियर के सफर को साझा किया, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे एक सीमित प्लेसमेंट वाले कॉलेज से निकलकर उन्होंने गूगल में L4 सॉफ्टवेयर इंजीनियर का पद हासिल किया। उनका संदेश स्पष्ट है: “आपको एक बेहतरीन शुरुआत की ज़रूरत नहीं है; आपको बस खेल में लंबे समय तक टिके रहने की ज़रूरत है।”

टियर 3 की चुनौतियाँ और निरंतरता की ताकत

टियर 3 कॉलेजों के छात्रों के लिए अक्सर गूगल, अमेज़न या फेसबुक जैसी कंपनियों में पहुँचना एक सपना जैसा होता है। अर्ची ने 2017 में भोपाल से अपनी इंजीनियरिंग पूरी की थी। जब उनके कॉलेज में केवल सर्विस-बेस्ड कंपनियाँ आ रही थीं, तब उन्होंने अपना ध्यान कंप्यूटर साइंस की बुनियादी बातों (Fundamentals) पर केंद्रित किया।

अर्ची ने अपनी पोस्ट में लिखा, “जब आप मेहनत कर रहे होते हैं, तो निरंतरता उबाऊ लग सकती है। कोई तत्काल जीत नहीं मिलती। बस बार-बार प्रयास करना होता है। लेकिन समय के साथ, यह जुड़कर बड़ा परिणाम देती है।”

मोड़: रिजेक्शन और सुधार

अर्ची का सफर उतार-चढ़ाव से भरा था। हैदराबाद में ‘ओपनटेक्स्ट’ (OpenText) में इंटर्नशिप के दौरान उन्हें कई बार रिजेक्शन का सामना करना पड़ा। जब उनकी सर्विस-बेस्ड कंपनी में जॉइनिंग के केवल 15 दिन बचे थे, तब उन्हें ओपनटेक्स्ट से फुल-टाइम ऑफर मिला।

2019 में उन्हें पहली बार गूगल से इंटरव्यू कॉल आया, लेकिन वह उसे क्लियर नहीं कर पाईं। उन्होंने इसे हार मानने के बजाय एक सीख के रूप में लिया। 2020 में वह ‘सर्विसनाउ’ (ServiceNow) से जुड़ीं, जहाँ उन्होंने हर दिन कम से कम एक डेटा स्ट्रक्चर और एल्गोरिदम (DSA) प्रश्न हल करने का नियम बनाया।

गूगल में चयन और विशेषज्ञ की राय

जून 2022 में गूगल ने उन्हें दोबारा संपर्क किया। इस बार वह पूरी तरह तैयार थीं। अक्टूबर तक चले लंबे इंटरव्यू दौर के बाद आखिरकार उन्हें वह ईमेल मिला जिसका उन्हें इंतज़ार था: “बधाई हो, आपका चयन हो गया है।”

आईटी विशेषज्ञों का मानना है कि अर्ची जैसी कहानियाँ इस बात का सबूत हैं कि टेक इंडस्ट्री अब ‘डिग्री’ से ज़्यादा ‘स्किल’ (कौशल) को महत्व दे रही है।

बेंगलुरु स्थित एक स्टार्टअप के सीनियर रिक्रूटमेंट एक्सपर्ट संदीप सिंह का कहना है, “आईआईटी या एनआईटी जैसे संस्थान आपको एक शुरुआती बढ़त ज़रूर देते हैं, लेकिन आज इंटरनेट के युग में सीखने के संसाधन सभी के लिए समान हैं। अब फर्क सिर्फ इस बात से पड़ता है कि आप कठिन समस्याओं को सुलझाने की कितनी क्षमता रखते हैं और बार-बार मिलने वाली असफलताओं के बावजूद आप कितनी मेहनत कर सकते हैं।”

भारतीय इंजीनियरिंग और बदलते हालात

भारत में हर साल 15 लाख से ज़्यादा इंजीनियर स्नातक होते हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम उच्च-स्तरीय सॉफ्टवेयर विकास के लिए तैयार होते हैं। टियर 3 कॉलेजों के छात्रों को अक्सर बुनियादी सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ता है। लेकिन अर्ची की सफलता दिखाती है कि अगर छात्र खुद को अपडेट रखें और लीडकोड (LeetCode) या गिटहब (GitHub) जैसे प्लेटफॉर्म का सही उपयोग करें, तो वे किसी भी बाधा को पार कर सकते हैं।

अर्ची गुप्ता की कहानी उन सभी युवाओं के लिए एक मिसाल है जो छोटे शहरों या सामान्य कॉलेजों से आते हैं। उनकी सफलता यह साबित करती है कि ‘कोई शॉर्टकट नहीं होता, बस हर दिन का प्रयास ही आपको मंज़िल तक पहुँचाता है।’

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