भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री वहीदा रहमान ने ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान द्वारा हाल ही में हिंदी फिल्म उद्योग में “सांप्रदायिक पूर्वाग्रह” और “सत्ता के बदलाव” के दावों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। गरिमा और व्यवहारिकता के साथ अपनी बात रखते हुए, 87 वर्षीय दादा साहब फाल्के पुरस्कार विजेता ने सुझाव दिया कि अनुभवी पेशेवरों के लिए काम के अवसरों में कमी अक्सर उम्र बढ़ने और दर्शकों की बदलती पसंद का परिणाम होती है, न कि धार्मिक भेदभाव का।
यह बहस एआर रहमान की उस टिप्पणी के बाद शुरू हुई जिसमें उन्होंने दावा किया था कि पिछले आठ वर्षों में बॉलीवुड में एक “शक्ति बदलाव” और “सांप्रदायिक पक्षपात” महसूस किया गया है। रहमान ने संकेत दिया था कि एक “गिरोह” उनके खिलाफ काम कर रहा है, जिसके कारण उनकी वैश्विक प्रतिष्ठा के बावजूद उन्हें हिंदी फिल्मों में कम प्रोजेक्ट मिल रहे हैं।
विवाद के बजाय शांति की अपील
सोशल मीडिया पर ध्रुवीकरण करने वाली इन खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए वहीदा रहमान ने शांति और राष्ट्रीय सद्भाव पर जोर दिया। द इंडियन एक्सप्रेस के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “हां, मैंने इसके बारे में पढ़ा है, लेकिन मैं इसमें कम गहराई तक जाने की कोशिश करती हूं। जब सब कुछ ठीक चल रहा हो, तो मैं इस पर ध्यान न देना बेहतर समझती हूं। ऐसी छोटी-छोटी चीजें हर देश में होती हैं।”
उन्होंने एकता का संदेश देते हुए कहा, “अपनी शांति से रहो, यह मुल्क हमारा है, बस खुश रहो। कम से कम मेरी उम्र में, मैं किसी भी चीज या किसी के साथ उलझना नहीं चाहती।”
उम्र बनाम पहचान: उद्योग की बदलती लहर
रहमान के अवलोकन का मुख्य बिंदु मनोरंजन जगत की चक्रीय प्रकृति है। उन्होंने उल्लेख किया कि रचनात्मक क्षेत्रों में काम का “उतार-चढ़ाव” एक सामान्य घटना है। उनके अनुसार, उद्योग की “नवेलेपन” की भूख अक्सर दिग्गजों को हाशिए पर धकेल देती है, चाहे उनकी पिछली उपलब्धियां या पृष्ठभूमि कुछ भी हो।
वहीदा रहमान ने विस्तार से बताया, “काम तो ऊपर-नीचे होता ही रहता है। एक उम्र के बाद लोग कहते हैं कि ‘किसी नए या अलग व्यक्ति को लाओ।’ यह सब कुछ लोगों के पीछे रहने का कारण बन सकता है। अगर कोई बहुत ऊंचाई पर पहुंचा है और सोचता है कि वह वहीं रहेगा और केवल उसी को लिया जाएगा, तो ऐसा नहीं होता है। यह उतार-चढ़ाव कोई नई बात नहीं है।”
व्यावसायिक दृष्टिकोण
वहीदा रहमान की भावनाओं की गूंज फिल्म निर्माता राम गोपाल वर्मा के बयानों में भी सुनाई दी। एक पॉडकास्ट के दौरान, वर्मा ने इस विचार को खारिज कर दिया कि बॉलीवुड में सांप्रदायिक पूर्वाग्रह है। उन्होंने तर्क दिया कि बॉलीवुड एक “पैसा बनाने वाली मशीन” है जो किसी को भी काम पर रखेगी—चाहे उसका जाति, पंथ या धर्म कुछ भी हो—जब तक कि वह बॉक्स-ऑफिस हिट या चार्ट-टॉपिंग ट्रैक की गारंटी दे सकता है।
विवाद की शुरुआत
यह विवाद तब शुरू हुआ जब एआर रहमान ने साक्षात्कार के दौरान उल्लेख किया कि उन्हें दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योगों या अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं की तुलना में मुंबई में कम फिल्में मिल रही हैं। उन्होंने इसे कुछ हलकों द्वारा उन्हें विशिष्ट परियोजनाओं से दूर रखने के समन्वित प्रयास के रूप में बताया।
रहमान ने बाद में एक स्पष्टीकरण जारी किया, जिसमें उन्होंने भारत के प्रति अपने समर्पण को दोहराया और स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य राष्ट्र को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि एक अधिक समावेशी और रचनात्मक वातावरण की आवश्यकता पर प्रकाश डालना था।
विशेषज्ञ की राय
फिल्म जगत के विशेषज्ञों का मानना है कि बॉलीवुड ऐतिहासिक रूप से संस्कृतियों का संगम रहा है, फिर भी यह वर्तमान में एक “तकनीकी और पीढ़ीगत बदलाव” से गुजर रहा है। अनुभवी ट्रेड एनालिस्टों का मानना है कि आधुनिक स्ट्रीमिंग और थिएटर रिलीज की मांगें अक्सर स्थापित महारत और उभरते रुझानों के बीच संघर्ष पैदा करती हैं।
निष्कर्ष: वहीदा रहमान की टिप्पणी फिल्म उद्योग के धर्मनिरपेक्ष इतिहास की याद दिलाती है। भारतीय सिनेमा की सबसे सम्मानित हस्तियों में से एक के रूप में, उनका दृष्टिकोण पहचान की राजनीति के बजाय पेशेवर जीवन की कठोर वास्तविकताओं पर ध्यान केंद्रित करता है।



