अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने पाकिस्तान को एक कठिन कूटनीतिक चौराहे पर खड़ा कर दिया है। जहाँ एक ओर ट्रंप प्रशासन ईरान पर “अधिकतम दबाव” की नीति अपना रहा है, वहीं दूसरी ओर इस्लामाबाद अपनी सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता को लेकर चिंतित है। वरिष्ठ सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान का शीर्ष सैन्य नेतृत्व इस समय अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को फिर से परखने में जुटा है।
क्षेत्रीय टकराव की आशंकाओं के बीच, पाकिस्तान के फील्ड मार्शल और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने हाल ही में देश के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई। इस बैठक में आईएसआई (ISI) प्रमुख और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जनरल आसिम मलिक सहित कई वरिष्ठ जनरल शामिल हुए।
सीमा सुरक्षा और शरणार्थी संकट का डर
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चिंता उसकी ईरान के साथ लगती 900 किलोमीटर लंबी संवेदनशील सीमा है। बैठक में अधिकारियों ने चेतावनी दी कि इस्लामाबाद एक और अस्थिर सीमा का बोझ नहीं उठा सकता, खासकर तब जब अफगानिस्तान के साथ लगती ‘डूरंड लाइन’ पहले से ही तनावपूर्ण है।
सैन्य नेतृत्व को डर है कि ईरान पर किसी भी अमेरिकी हमले या “सत्ता परिवर्तन” की स्थिति में:
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शरणार्थियों का सैलाब: ईरान से लाखों लोग पलायन कर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में आ सकते हैं, जिससे देश की चरमराई अर्थव्यवस्था पर और बोझ बढ़ेगा।
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सीमा पार आतंकवाद: ईरान में अस्थिरता का फायदा उठाकर उग्रवादी गुट फिर से सक्रिय हो सकते हैं, जिससे सीमा पर हिंसक झड़पें बढ़ सकती हैं।
क्या अमेरिका मांगेगा सैन्य ठिकाने?
बैठक में एक और संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा हुई: अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मांग। सूत्रों का कहना है कि सैन्य नेतृत्व को डर है कि यदि अमेरिका ईरान पर हमला करता है, तो वह पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र या सैन्य ठिकानों तक पहुंच मांग सकता है।
यदि पाकिस्तान यह मांग स्वीकार करता है, तो ईरान के साथ उसके संबंध हमेशा के लिए खराब हो जाएंगे और देश के भीतर भी भारी विरोध प्रदर्शन होंगे। लेकिन यदि वह इनकार करता है, तो ट्रंप प्रशासन के साथ उसके सुधरते संबंधों और मिलने वाली वित्तीय सहायता पर आंच आ सकती है।
एक वरिष्ठ राजनयिक ने द एक्सप्रेस ट्रिब्यून को बताया, “पाकिस्तान किसी पड़ोसी देश पर हमले के लिए लॉन्चपैड बनने का जोखिम नहीं उठा सकता। पिछले दो दशकों का सबक स्पष्ट है: क्षेत्र की अराजकता सीमाओं के भीतर नहीं रहती।”
आंतरिक सांप्रदायिक तनाव का खतरा
पाकिस्तान के भीतर लगभग 20-30% शिया आबादी है, जिनकी ईरान के प्रति गहरी सहानुभूति है। सेना को डर है कि ईरान पर किसी भी हमले को सांप्रदायिक रंग दिया जा सकता है, जिससे पाकिस्तान के भीतर दंगे भड़क सकते हैं।
इसे रोकने के लिए, सेना ने हाल ही में राष्ट्रीय पैगाम-ए-अमन समिति के धार्मिक विद्वानों के साथ एक बैठक की। इस बैठक का उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर आम सहमति बनाना और भारत जैसे “विदेशी शत्रुओं” द्वारा फैलाए जा रहे मनोवैज्ञानिक युद्ध का मुकाबला करना था।
मध्यस्थता की कोशिश: कूटनीतिक रास्ता
इन चुनौतियों के बावजूद, पाकिस्तान खुद को एक मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। आईएसआई प्रमुख को तुर्की, कतर, सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के साथ संपर्क बढ़ाने का निर्देश दिया गया है ताकि स्थिति को शांत किया जा सके। पाकिस्तान पहले से ही वाशिंगटन में ईरान के राजनयिक हितों का प्रतिनिधित्व करता है, जो उसे एक अनूठा ‘बैक-चैनल’ संवाद का अवसर देता है।
निष्कर्ष
ट्रंप प्रशासन की “अमेरिका फर्स्ट” नीति और ईरान के प्रति उनके कड़े रुख ने पाकिस्तान को एक ऐसी स्थिति में डाल दिया है जहाँ उसे अपने “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) की रक्षा करनी होगी। आने वाले हफ़्ते यह तय करेंगे कि क्या इस्लामाबाद इस क्षेत्रीय तूफान से सुरक्षित निकल पाएगा या वह एक और बड़े युद्ध की लपेट में आ जाएगा।


