Monday, January 19, 2026
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यूट्यूब से कोडिंग सीखकर बनाई AI कंपनी: रुचिर बरोनिया की

सिलिकॉन वैली और न्यूयॉर्क के तेजी से बदलते तकनीकी परिदृश्य में, “स्व-शिक्षित संस्थापक” (self-taught founder) की कहानी को एक नया और प्रभावशाली नायक मिला है। भारतीय मूल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर रुचिर बरोनिया इन दिनों न केवल मेटा (Meta) जैसी प्रतिष्ठित कंपनी को छोड़ने के लिए, बल्कि अपनी विशेषज्ञता की अपरंपरागत जड़ों के लिए भी चर्चा में हैं। Frontdesk के संस्थापक और सीईओ बरोनिया ने हाल ही में खुलासा किया कि उनके करियर की नींव किसी हाई-टेक लैब में नहीं, बल्कि उनके बचपन के कमरे में यूट्यूब (YouTube) ट्यूटोरियल के माध्यम से रखी गई थी।

बरोनिया की कहानी तकनीकी क्षेत्र में आ रहे एक बड़े बदलाव का प्रतीक है, जहाँ सूचनाओं तक लोकतांत्रिक पहुँच पारंपरिक बाधाओं को दरकिनार कर रही है।

‘बेडरूम कोडर’ से स्टार्टअप तक का सफर

यह यात्रा एक स्कूल छात्र के रूप में शुरू हुई। बरोनिया ने शाम का समय यूट्यूब पर कोडिंग ट्यूटोरियल देखने में बिताया। उनके शुरुआती प्रयोग सरल थे: अपने फोन पर आवाज-आधारित एप्लिकेशन बनाना जो सामान्य निर्देशों का जवाब दे सकें।

“मैंने सिर्फ यूट्यूब से कोडिंग सीखी थी। मेरे ऐप्स डाउनलोड हो रहे थे, और मुझे इसकी लत लग गई थी,” बरोनिया ने बिजनेस इनसाइडर को बताया। युवा डेवलपर के लिए रोमांच केवल कोडिंग के तर्क में नहीं था, बल्कि डिजिटल मार्केटप्लेस से मिलने वाली तत्काल प्रतिक्रिया में था। “मैं स्कूल से घर भागता, अपना बैग रखता और होमवर्क शुरू करने से पहले रिव्यू (समीक्षाएं) खोलता। यह पहली बार था जब मैंने देखा कि मेरे बेडरूम में अकेले लिखा गया कोड उन लोगों तक पहुँच सकता है जिनसे मैं कभी नहीं मिलूँगा।”

मेटा का अनुभव: वैश्विक स्तर पर सीख

अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, बरोनिया मेटा में शामिल हो गए, जहाँ उन्होंने उनके फिनटेक (fintech) विभाग में काम किया। बरोनिया ने अपनी यूनिट को एक “आंतरिक स्टार्टअप” के रूप में वर्णित किया, जहाँ इंजीनियरों को उनके प्रोजेक्ट्स पर महत्वपूर्ण स्वामित्व दिया गया था।

मेटा में, बरोनिया ने यह सीखा कि अरबों लोगों के लिए उत्पादों को कैसे तैयार और लॉन्च किया जाता है। इस अनुभव ने उनकी “सीखने की गति को तेज” कर दिया, जिससे उन्हें वैश्विक सिस्टम के संचालन का गहरा ज्ञान प्राप्त हुआ। हालांकि, कॉर्पोरेट जगत की सुरक्षा के बीच भी, उनके भीतर का “बेडरूम कोडर” जीवित था। उन्होंने साइड प्रोजेक्ट्स पर काम करना जारी रखा। उनका एक AI प्रयोग इतना वायरल हुआ कि सैकड़ों व्यवसायों ने उनसे संपर्क करना शुरू कर दिया। यहीं से उनकी उद्यमिता की यात्रा शुरू हुई।

कठिन निर्णय: वेतन की सुरक्षा बनाम नवाचार

मेटा जैसी कंपनी को छोड़ना आसान नहीं था। इसका मतलब था एक शानदार वेतन, स्टॉक रिफ्रेशर्स और एक वैश्विक निगम की स्थिरता को त्यागना।

बरोनिया ने स्वीकार किया, “छोड़ना आसान नहीं था। मेटा आरामदायक थी, वहाँ बहुत अच्छा वेतन और दिलचस्प समस्याएं थीं। हर किसी ने मुझसे कहा कि एक साल और रुक जाओ, अधिक इक्विटी हासिल करो। लेकिन मुझे लगा कि AI क्रांति का यह अवसर सीमित समय के लिए है। हर वह महीना जो मैं वहाँ बिता रहा था, वह एक ऐसा महीना था जब मैं इन व्यवसायों की सेवा नहीं कर पा रहा था।”

फ्रंटडेस्क (Frontdesk): व्यापारिक बातचीत का स्वचालन

बरोनिया ने कैलिफोर्निया की सुख-सुविधाओं को छोड़कर न्यूयॉर्क शहर की ऊर्जा को चुना, जहाँ उन्होंने Frontdesk की स्थापना की। इस स्टार्टअप का मिशन व्यवसायों के सबसे थकाऊ काम—विशेष रूप से वॉयस कॉल और ग्राहकों के साथ बातचीत—को AI के माध्यम से स्वचालित करना है।

पारंपरिक “सेल्स के लिए 1 दबाएं” वाले पुराने सिस्टम के विपरीत, फ्रंटडेस्क जटिल और सूक्ष्म बातचीत करने के लिए जनरेटिव AI (Generative AI) का उपयोग करता है। इसका लक्ष्य छोटे और मध्यम उद्योगों को एक परिष्कृत रिसेप्शनिस्ट सेवा प्रदान करना है।

विशेषज्ञ विश्लेषण: AI क्षेत्र में भारतीय प्रवासी

उद्योग जगत के विशेषज्ञ बरोनिया के इस कदम को एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति के रूप में देखते हैं।

“रुचिर की यात्रा वर्तमान AI लहर के बारे में एक मौलिक सत्य को उजागर करती है: सीखने की बाधाएं अब खत्म हो गई हैं, लेकिन बड़े स्तर पर सफल होने के लिए अनुभव जरूरी है। यूट्यूब से सीखी गई चपलता और मेटा के अनुभव का संयोजन बरोनिया जैसे संस्थापकों को पारंपरिक बिजनेस मॉडल को बदलने की ताकत देता है।” — आलोक शर्मा, वेंचर कैपिटल विश्लेषक।

स्व-शिक्षा की सफलता का भविष्य

जैसे-जैसे फ्रंटडेस्क न्यूयॉर्क में अपना विस्तार कर रहा है, रुचिर बरोनिया की कहानी भारतीय इंजीनियरों की अगली पीढ़ी के लिए एक शक्तिशाली प्रेरणा है। यह साबित करता है कि जहाँ डिग्री का अपना महत्व है, वहीं समस्याओं को हल करने का जुनून और यूट्यूब जैसे खुले मंचों से सीखने की इच्छा ही नवाचार के असली उत्प्रेरक हैं।

आज की तकनीकी अर्थव्यवस्था में, किसी भारतीय बेडरूम और न्यूयॉर्क के सीईओ कार्यालय के बीच की दूरी अब मील या डिग्री से नहीं, बल्कि उस कोडिंग और मेहनत से मापी जाती है जो आप दुनिया के सोने के दौरान करने के लिए तैयार हैं।

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